प्रत्येक बूँद अपने आप में अपना भाग्य समेटे होती है और प्रत्येक बूँद का अपना महत्व होता है|एक बूँद जब किसी के आँखो से गिरती है तो उसमें पीड़ा होती है दर्द होता है और वही बूँद जब अंबर से टपकती है तो धरती की प्यास बुझाती है, आनंद व जीवनदायिनी होती है|
इन्ही पहलुओं पर प्रकाश डालती और तमाम बाते बयाँ करती ये मेरी लिखी अत्यंत ही भावनात्मक एवं प्रासंगिक कविता.....
किनको कहुँ मैं 'अप्रत्यासित'?,
बरस रहीं है कुछ अंबुद से,
कुछ श्वेत मध्य काली छतरी से,
एक दहा रही है अग्नि,
मिटा रही है इक आग,
है मिटा रही दोनो संताप,
इक टपका सिर पर तो 'तन' भीगा है,
इक ठिठका नयनों से तो 'मन' भीगा है,
इक बरसा तो मिली है 'वाह',
इक बरसा जैसे लगी है 'आह',
कुछ पत्तो पर आ अटकी,
कुछ पलकों पर आ ठिठकी
एक 'घिरा' तो बरसा है,
एक 'गिरा' तो बरसा है,
एक बरसा तो 'सावन' आया,
एक बरसा तो 'मन' भर आया,
एक बरसा तो गिद्ध उड़े है,
एक बरसा तो नाचें मोर,
बरसा एक तो कोयल की कूँक,
एक बरसा तो टिटहरी बोल,
अब इन बूँदो का क्या है दोष,
अपने आप पे कैसा रोष
हर बूँदो का अपना भाग्य,
सुख जाएँगीं कुछ,
कुछ बह जाएँगीं,
कुछ पा कर धारा नदिया की,
प्यास बुझाते, भँवर बनाते,
जाकर सागर से मिल जाएँगीं|
© गौरव पाण्डेय |
© गौरव पाण्डेय |
वाह।
ReplyDeleteधन्यवाद आदरणीय|
DeleteNice...
ReplyDeleteThanks alot.
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ReplyDelete👍👍👍👌👌👌☝☝☝👏👏👏
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