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अब स्वभाविक तो है, पर कितना ऊचित है...???

                         वर्तमान समय अंधे दौड़ का समय है, मंजिल तक पहुँचने के लिए लोग धुर्ततता को नीति का अंगुलीजामा पहनाकर नैतिकता का त्याग करने में रत्ती भर भी संदेह नहीं करते|आज के समय में इंसान भावनाओं का दमन एवं अपमान कर स्वयं को बड़ा ही आधुनिक प्रस्तुत करना चाहता है, वास्तविक धन जो रिश्ते-नाते, माँ-बाप व अपनों का स्नेह है को गवाँ कर दुसरा धन जो अर्थ है को अर्जित करने में स्वंय को सार्थक समझता है|
           एेसी ही भ्रमित व मिथ्याधार जीवन के पहलूओं पर प्रकाश डालती व ऊर्जावान जीवन की थकान बताती ये मेरी लिखी एक कविता.............

अब स्वभाविक तो है,
पर कितना उचित है,
तन सोया मन लड़ रहा है,
मनुज सब कुछ छोड़ने को तैयार है,
                  अपने-पराये, जाने-अनजाने,
                   मीठी बाते, पुरानी यादें
                   सुबह की धुप, नीम की छाँव,
                   अपना घर, बचपन का गाँव,
मनुज आगे बढ़ने को तैयार है,
शांति को छोड़कर ,
भीड़ की हर-हर-पट-पट में,
चलने को तैयार है,
                   हास्यपद है, परिहास्यपद है, उपहास्यपद है,
                   पर है,
                   धन को छोड़ धनी बनने को तैयार है,
                   श्रम कर थकने के बजाय
                   बैठा सड़ने को तैयार है,
सत्य के आनंद को छोड़,
मिथ्याजीवन को आतुर,
यथार्थ से कहीं दुर
भ्रमित हो जीने को तैयार है,
                   शीतल हवाओं की इच्छा,
                   और खेतों से घृणा,
                   फिर क्या ?
                   वातानुकूल को तैयार है,
न जाने कैसे पर 
जीवन की आपा-धापी में,
आश्चर्य है!
जीने की चाह में,
मर जाने को तैयार है,
                  अब स्वभाविक तो है,
                  पर कितना ऊचित है........???
                                              © गौरव पाण्डेय |



Comments

  1. बहुत सुन्दर।

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  2. अब स्वाभाविक तो है पर कितना उचित है?? यक्ष प्रश्न!

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  3. यथार्थवादी कविता..बहुत सुन्दर|

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