जब प्रेम प्रकाशित होता है तो मन में इस कदर प्रभाव उत्पन्न करता है की उसके आगे और कुछ भी दिखाई नहीं देता, प्रत्येक वस्तु में बस उसे अपने प्रियतम का चेहरा ही दिखाई देता, यहाँ तक की उसे अपने परछाईं में भी अपने प्रियतम की ही झाँकी महसूस होती है|
ऐसे ही एक समर्पित प्रेम में अपना अस्तित्व खोए एक प्रेमी का हाल बयाँ करती ये मेरी कविता...!!!
प्रतिबिंबीत नहीं है कुछ,
बस छायांकित तुम हो
है भूल गया यादों से सर्वस्व,
अब बस रेखांकित तुम हो,
क्या प्रयोजन? क्या सुनियोजन?
जो भी बचा है जीवन में अब शेष,
उन सबको आधारित तुम हो,
अंतरमन में गूँज है जो,
सकल शब्द उच्चारित तुम हो,
जो प्रदर्शित है चहूँओर,
प्रतिबिंब है मेरा और छायांकित तुम हो...!!!
© गौरव पाण्डेय|
ऐसे ही एक समर्पित प्रेम में अपना अस्तित्व खोए एक प्रेमी का हाल बयाँ करती ये मेरी कविता...!!!
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| स्वयं को एक दूसरे में पाना ही प्रेम है! |
प्रतिबिंबीत नहीं है कुछ,
बस छायांकित तुम हो
है भूल गया यादों से सर्वस्व,
अब बस रेखांकित तुम हो,
क्या प्रयोजन? क्या सुनियोजन?
जो भी बचा है जीवन में अब शेष,
उन सबको आधारित तुम हो,
अंतरमन में गूँज है जो,
सकल शब्द उच्चारित तुम हो,
जो प्रदर्शित है चहूँओर,
प्रतिबिंब है मेरा और छायांकित तुम हो...!!!
© गौरव पाण्डेय|

Able to feel...
ReplyDeleteAble to feel...
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद!
ReplyDeleteActually correct
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