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अग्निकुण्ड : Agnikund

       मेरा, आपका, हम सबका जीवन एक 'अग्निकुण्ड' के समान होता है| हम जीवन में जीते कम और बलिदान ज्यादा देते हैं, जीवन के इस सफर में हमारे पास जब कुछ नहीं रह जाता है तब भी जो शेष रह जाता है जिससे हम पुन: सब कुछ प्राप्त कर सकते है एकमात्र वह स्वयं का स्वयं पर विश्वास और उससे उपजी उम्मीद ही होती है जो हमें आत्मबल प्रदान कर फिर से खड़ा करती है और हमें इस जीवनरण में अविजीत बनाती है और जिसके शौर्य से उपजी कीर्ति चहूँओर गूँजाएमान होती है|
        ऐसी ही जीवन रण में हताशा में उम्मीद की बिगुल फूंकती मेरी एक अत्यंत ही रचनात्मक कविता..........
स्वाहा!

पूजित कुण्ड, सुसज्जित कुण्ड, अग्निकुण्ड-अग्निकुण्ड
स्वाहा करने पाप स्वयं के, आ पहुँचा मैं यग्यशाला
प्रयासों की लकड़ीयाँ हैं, है उम्मीदों की बाती,
तीव्र इच्छा और उतकण्ठा से जला रहा हूँं बाती,
दहक रही है अग्नि, लहक रही है अब लकड़ी
कुछ लिए हैं दुख, कुछ दिए हैं दुख, कुछ यूँ ही मिल गए हैं मुफ्त
मिटा देने को सब संताप, हूँ मैं डाल रहा आहूति,
दहक रही है अब अग्नि, तप रहा है अग्निकुण्ड, जला रही है बाती,
दमित हो रहा है ऋण, मैं हो रहा हूँ उत्तीर्ण,
कर वंदन सर्वेश्वर का, हूँ मैं डाल रहा आहूति,
जो खोया था अंतरमन में, है गूँज रहा जग सारा,
दिप्तीत है अग्निकुण्ड, है मिट रहा सकल अधियाँरा
दिर्घकाल था प्रश्नकाल मैं मौन बैठा था,
पा गया जब उत्तर, मैं अब बोल रहा हूँ 'स्वाहा' !
                                                 © गौरव पाण्डेय|




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