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Showing posts from January, 2017

देखो आया बसंत "ऋतुराज"! : Dekho aaya Basant "Rituraaj" !

      बंसत ऋतु को सर्वश्रेष्ठ ऋतु ऋतुराज कहा जाता है| इस समय धरा धानी परिधान धारण करती है, प्रकृति इतनी सुन्दर व मनमोहक हो जाती है जैसे सोलह श्रिंगार किये कोई दुल्हन हो, इसी समय हिंदी पंचांग का आखिरी मास फाल्गुन समाप्त होता है और प्रथम मास चैत्र आरंभ होता है और नववर्ष हमारा आता है|      इसी मधुुमास का वर्णन करती और सुंदरता बताती मेरी कविता........!!!     खेतो के हुए पीले हाथ, देखो आया ऋतुराज, गई कंबलों की अब रात, आया अब धुप का राज, किया है कोकिल ने गान, अब हुआ नया विहान, धरा हुई अब धानी, कण-कण आतुर करने को मनमानी, खत्म हुआ फुलों का अवकाश, उन पर मधुप तितलीयों का है वास, देखो अब आया मधुमास, हर डाली नव कोमल पात, हर कली से अब हुआ प्रभात, मादकता में बौराया आम, चढ़ा लताओं को उन्माद, चुमे उसने सीसम के गात, कण कण को है चढ़ा प्रमाद, देखो! आया बसंत ऋतुराज! चली हवा बसंती दिन में, हुई है मंगल हर शाम, बजा है ढ़ोलक मिला है ताल, नाचे देव, मनुज, भूत-बैताल, अब आई सर्वोत्तम शिवरात, मिलेंगे प्रथम और अंतिम मास, अ...

मैं बुला तो सकता हूँ, भूला नहीं सकता....!!!

                    लंबे समय तक दूर रहने से उपजा संकोच जो कवि की प्रियतमा को उसके प्रिय(कवि) के पुन: पास आने में बाधक बन रहा है, इस विषम परिस्थिति में कवि अपने प्रियतमा को उसके प्रेम के प्रति मुखर करता है और किस प्रकार मर्यादाओं का सम्मान रखते हुए वह उससे जुड़ता है तथा एक सच्चे प्रेम को सार्थक करने की जुुगत करता है, इसी के प्रयासों का प्रासंगिक वर्णन करती ये मेरी कविता.......!!! वापस आने से कतराते हो, क्या तुम शरमाते हो? या बंदिशे हैं  कोई  जो उलझ जाते हो, उठाओ तो पग को बढ़ पड़ेंगे, खुद-ब-खुद मेरी तरफ, नजरें झुकाए पलकों को उठाओ परिदृश्य दिखाई देगा मेरा तुम में, पास आओ देखो मुझे, महसूस करो, ढूढ़ पाओगे खुद को मुझमें, वीराने में गूँजती आवाज, सुन पाओगे, मयस्सर होगा चिराग, सकल आलोकित देख पाओगे, गुम है जिंदगानी जो फिर से पाओगे, स्याह रात में झिलमिल तारे फिर दिख जाएँगें कदम उठा जब पास आओगे, देख रहे हो  फिर विलंब कैसा? विचारों में उलझे हो, या संतप्त किसी से! गर देख सको तो देखो संलिप्त हो मुझी से अती...

अग्निकुण्ड : Agnikund

       मेरा, आपका, हम सबका जीवन एक 'अग्निकुण्ड' के समान होता है| हम जीवन में जीते कम और बलिदान ज्यादा देते हैं, जीवन के इस सफर में हमारे पास जब कुछ नहीं रह जाता है तब भी जो शेष रह जाता है जिससे हम पुन: सब कुछ प्राप्त कर सकते है एकमात्र वह स्वयं का स्वयं पर विश्वास और उससे उपजी उम्मीद ही होती है जो हमें आत्मबल प्रदान कर फिर से खड़ा करती है और हमें इस जीवनरण में अविजीत बनाती है और जिसके शौर्य से उपजी कीर्ति चहूँओर गूँजाएमान होती है|         ऐसी ही जीवन रण में हताशा में उम्मीद की बिगुल फूंकती मेरी एक अत्यंत ही रचनात्मक कविता.......... स्वाहा! पूजित कुण्ड, सुसज्जित कुण्ड, अग्निकुण्ड-अग्निकुण्ड स्वाहा करने पाप स्वयं के, आ पहुँचा मैं यग्यशाला प्रयासों की लकड़ीयाँ हैं, है उम्मीदों की बाती, तीव्र इच्छा और उतकण्ठा से जला रहा हूँं बाती, दहक रही है अग्नि, लहक रही है अब लकड़ी कुछ लिए हैं दुख, कुछ दिए हैं दुख, कुछ यूँ ही मिल गए हैं मुफ्त मिटा देने को सब संताप, हूँ मैं डाल रहा आहूति, दहक रही है अब अग्नि, तप रहा है अग्निकुण्ड, जला रही है बाती, दम...

अब स्वभाविक तो है, पर कितना ऊचित है...???

                          वर्तमान समय अंधे दौड़ का समय है, मंजिल तक पहुँचने के लिए लोग धुर्ततता को नीति का अंगुलीजामा पहनाकर नैतिकता का त्याग करने में रत्ती भर भी संदेह नहीं करते|आज के समय में इंसान भावनाओं का दमन एवं अपमान कर स्वयं को बड़ा ही आधुनिक प्रस्तुत करना चाहता है, वास्तविक धन जो रिश्ते-नाते, माँ-बाप व अपनों का स्नेह है को गवाँ कर दुसरा धन जो अर्थ है को अर्जित करने में स्वंय को सार्थक समझता है|            एेसी ही भ्रमित व मिथ्याधार जीवन के पहलूओं पर प्रकाश डालती व ऊर्जावान जीवन की थकान बताती ये मेरी लिखी एक कविता............. अब स्वभाविक तो है, पर कितना उचित है, तन सोया मन लड़ रहा है, मनुज सब कुछ छोड़ने को तैयार है,                    अपने-पराये, जाने-अनजाने,                    मीठी बाते, पुरानी यादें                    सुबह की...

भारत में नोटबंदी : Demonetisation in India

                               नोटबंदी का फैसला अत्यंत ही तेज , अचानक और  चौंका  देने वाला था, परंतु ये निर्णय अर्थ जगत में बड़ा ही  आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाला था|शहरी जीवन नें आपसी सामंजस्य, भाईचारा, विश्वास की कमी रहती है सो वहाँ कुछ लोगो को समस्याएँ हुईं परंतु ग्रामीण इलाके में सबने मिल-जुल कर सहयोग भावना से इससे कम प्रभावित हुए|जो समस्या हुई वो नोट बदलनेे में ही प्रमुख रही|             हालांकि विरोधी दलो ने एकजुट होकर जमकर बवाल काटा, लेकिन जनता ने तमाम समस्याओं के बावजुद सरकार के इस फैसले का बड़े ही उत्साह से स्वागत किया|      इसी समय की राजनीति का हाल बयां करती मेरी एक कविता.............. है बेअसर अब नरेन्द्र पर बंगाली ममता और काली माया , जो है मनुज पर कहता अखिलेश साथ  ऐ.के.  को भी कुछ समझ न आया, ये निर्णय था तीव्र प्रहार काले-धन-मन वालों पर, ये थप्पड़ था जोरदार औछी राजनीति वालों पर, ये निर्णय था तीव्र प्रहार नाम शिवपाल रखे...

"How to 'FAIL' the 'FAILURE' ?"

                       This is extremely massive challenge for everyone, "transform impossible into possible" means "how to fail the failure?........           There are some extreme ideas with which you may solve the extreme problems of your life and get overcome on your weakness and failure....!!!  1- DESIRE to achieve should be greater          than the fear of failing. 2- GIVING UP is the only sure to fail. 3- START TODAY, here and now and     Explore,Dream and Discover. 4- Don't count your age by the years     passed, but the moments you smiled     when you achieved something. 5- Yesterday is not ours to recover, but     tomorrow is ours to WIN or LOSE . 6- Stay HEALTHY, thinks POSITIVE,      try HARDER  and Failure will itself      Fail.  ...

"LOVE is lie, the HATE is true" : "LIFE is lie, the DEATH is true"......

                         "This is the poem all about truth of the life".                         On ce upon a time when I got frustrated in the blind race of life and was alone, helpless, everyone were busy in himself, neither anyone was interested nor tried to understand my feelings and no-one  came out to show sympathy or stand with me.                  These lines are not applicable on me only but rather for all........  The world is lie,  their people  are lie, The brightness is lie ,the darkness is true, The speakers  are lie, the dumb is true, Lie is the scielence , voilence  is paradox,          Deaf &  dumb the true is who,          Whatever appear is false,          Truth...

किन बूँदो को 'रजत' कहूँ मैं..? : Kin bundo ko 'Rajat' kahun mai?..

                      प्रत्येक बूँद अपने आप में अपना भाग्य समेटे होती है और प्रत्येक बूँद का अपना महत्व होता है|एक बूँद जब किसी के आँखो से गिरती है तो उसमें पीड़ा होती है दर्द होता है और वही बूँद जब अंबर से टपकती है तो धरती की प्यास बुझाती है, आनंद व जीवनदायिनी होती है|                                 इन्ही पहलुओं पर प्रकाश डालती और तमाम बाते बयाँ करती ये मेरी लिखी अत्यंत ही भावनात्मक एवं प्रासंगिक कविता..... किन बुँदों कि ' रजत ' कहुँ मैं? किनको कहुँ मैं ' अप्रत्यासित '?, बरस रहीं है कुछ अंबुद से, कुछ श्वेत मध्य काली छतरी से,                     एक दहा रही है अग्नि,                     मिटा रही है इक आग,                     है मिटा रही दोनो संताप, इक टपका सिर पर तो ' तन ' भीगा है, ...

इस कवि की कविता कौन? :Is kavi ki kavita kaun?

            एक लड़का जो बहुत ही गंभीर है,किसी से भी कुछ नहीं कहता है और एक दिन अचानक उसे एक लड़की से पहली ही नजर में प्यार हो जाता है, पर इसका उन्माद भी वो अंतरमन में ही दबाए रहता हैं|            पढ़िए उसका हाल, उसका अपने प्रियतमा से मिलने की आतुरता और व्याकुलता....... इस कवि की कविता कौन? किसमें खेवूँ ऩाव मैं अपनी, इस जीवन की सरिता कौन?                भवसागर है अंतरमन,                लहरों में किसकी आहट है!                हो चकित कभी जो देखा तड़के                वही ऊपर आकाश पुराना! है अपार अपार अनुभव और याद, पर विस्मित सकल जगत है, है रह गया बस 'तुम्हारा ध्यान',                चेतन मन में याद हो तुम                उस अवचेतन  मिलन से,        ...