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चलो बाहर चलें....!!! : chalo bahar chale...!

     भागते-भागते हम इतनी दूर निकल आते हैं की स्वयं ही भाग कर स्वयं से दूर हो जाते है|चाहे दफ्तर हो या घर हम कमरे में बंद रह जाते हैं, तमाम सुख और सुविधाएं भी नागवार लगने लगती हैं जब खुश तो होते पर आनंद महसूस नहीं कर पाते,
और जब मन उद्विग्न हो कमरो का बंधन तोड़ता है तो जुड़ जाते है हम प्रकृति से महसूस कर पाते हैं स्वयं को और आनंदित हो जाते है|
          इसी द्वदं और स्वछंदता को रेखांकित करती ये मेरी कविता.....!!!
दौड़ो की पा जाओ खुद को!

बहुत उब होती है इस कमरे में,
चलो बाहर चले,
पास में धारा नदिया की,
चलो रेत पर नंगे पाँव चले,
इन रेतो पर नाम लिखो,
इन रेतो पर एक शाम लिखो,
उकेरो कोई चित्र 
की बन जाए कहानी,
आज फुर्सत है,
की कर जाओ मनमानी,
उठाओ कोई पत्थर,
कि फेको दूर,
खो दो अपने आप को
कि थे मजबूर,
दौड़ो आँखे मूँद कर,
कि भीड़ नहीं है,
डरना मत की दौड़ है,
कोई मीर नहीं है,
आज खुद से मिले हो
एक अर्से के बाद,
चिल्ला लो खुब,
कह लो अंतस की बात,
हल्का हुआ महसूस
न जाने कब के बाद,
लो लंबी सांसे 
की मन में हो जाए प्रकाश,
लिपटो हवाओं से 
नहीं धूल धुओं का राज,
गा लो कोई गीत
की मन हर्षाया आज,
महसूस करो खुद को
कि टूटा है कमरों का बंधन,
भरो उड़ाने चाहे जितनी ऊची,
है मिला तुम्हे बिन बंधो का,
उनमुक्त पूरा नीला आकाश !
प्रकृति हुई सहाय ये टूटे बंधन,
करो मुक्त भाव से अपना स्वयं अभिनंदन!
                                       © गौरव पाण्डेय|

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