भ्रामिकता खण्डन करने और स्वयं को पा लेने की इच्छा जब तुल पकड़ती है तो सन्यास का भाव जाग्रित होता है....
जब दूर होगी कश्मकश,
मैं चल दूँगा,
जब कार्य मेरा पूर्ण होगा,
मैं बढ़ लूँगा,
प्रथम का गौरव छोड़,
सारे बंधन तोड़,
पावन गंगा को निर्मल करने,
छोड़ कर मुख्य धारा,
पावन धारा में बहने,
ना कोई भोग, ना कोई लोभ
बिन वियोग करूँगा योग,
कभी हिमालय की गुफा होगी,
होगा कभी गंगा का तट,
अनुराग त्याग वैराग्य भाव से,
मैं ध्यान मग्न और तटस्थ,
उन्माद-अवसाद की कड़ीयाँ तोड़,
मोड़ स्वयं को अंतस की ओर,
राग-द्वेष से होकर मुक्त,
मैं अपनी सीमाएँ तोड़,
लूँगा स्वयं को शुन्य से जोड!
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| ||ओउम्|| |
मैं चल दूँगा,
जब कार्य मेरा पूर्ण होगा,
मैं बढ़ लूँगा,
प्रथम का गौरव छोड़,
सारे बंधन तोड़,
पावन गंगा को निर्मल करने,
छोड़ कर मुख्य धारा,
पावन धारा में बहने,
ना कोई भोग, ना कोई लोभ
बिन वियोग करूँगा योग,
कभी हिमालय की गुफा होगी,
होगा कभी गंगा का तट,
अनुराग त्याग वैराग्य भाव से,
मैं ध्यान मग्न और तटस्थ,
उन्माद-अवसाद की कड़ीयाँ तोड़,
मोड़ स्वयं को अंतस की ओर,
राग-द्वेष से होकर मुक्त,
मैं अपनी सीमाएँ तोड़,
लूँगा स्वयं को शुन्य से जोड!

Bhut acchaa hai
ReplyDeleteधन्यवाद!
DeleteWaaah
ReplyDeleteधन्यवाद!
ReplyDeleteवाह। क्या बात?
ReplyDeleteधन्यवाद|
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