| उम्मीद प्रकाशित होगी जब, मिलन हमारा होगा तब! |
तुम दूर जाती रही, मैं गुनगुनाता रहा,
मेरा विश्वास था, मैं मुस्कुराता रहा,
मेरे भावों से ऊठी लहरे तमाम,
मैं साहिल पे खड़ा गुनगुनाता रहा,
मुझे क्या पता था, जमाना था बदला,
कस्ती का अब, किनारा था बदला,
चमकता हुआ चांद दागी हुआ,
ऱोशनी वही थी बस उजाला था बदला,
जख्म बने तो नज्म भी बदले
पीर बढ़ती गई, हकिम गवाँरा हुआ,
कैसे कहें की क्या-क्या हुआ,
ऐसे में बसर कैसे हमारा हुआ,
जो भी स्पष्ट था, सब धुआ सा दिखा,
जो जला दे,वो चिंगारी भी बदली,
हर चमक अब टूटा सितारा हुआ,
जो भी सोचा न था वो सब कुछ हुआ,
समय बीतता गया, जख्म भरते गए,
रह गया दाग था जो घाव का,
उनका दिया था हमारा रहा,
हवाएँ चली, गम के बादल छटे,
फिर बदला शहर, कोई हमारा हुआ
साअत भी बदली, सियासत भी बदली,
नजरें वही थी, नजाकत थी बदली,
हम सीधे से थे, अब अंदाज आया,
मुश्किले गईं, बहारों से राबता बन गया,
मैं उलफत में फिर कायदा भूल गया,
अब मुस्कुराया, फिर मुस्कुराता गया,
लेकर दरिया का मजा, अब जो तुम साथ थे,
मेरा विश्वास था, मैं मुस्कुराता रहा,
मैं साहिल पे खड़ा गुनगुनाता रहा |
© गौरव पाण्डेय|
बहुत सुन्दर लिखते हो।
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद!
DeleteExcellent
ReplyDeleteधन्यवाद!
DeleteVery nice
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