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...कि पा जाऊँ रोटीयाँ ! : Ki paa jaoon Rotiyan!

      हमारे फेंके कबाड़ से भी किसी का जीवन सवरता है, जो हमारे लिए कचरे का ढ़ेर होता है वही किसी भुखे के लिए दो वक्त की ऱोटी का एक संसाधन होता है!
            यह मेरी कविता एक ऐसे ही बच्चे के भावों का मार्मिक चित्रण करती है, जिसके लिए कबाड़ ही पेट की आग मिटाने का जुगाड़ है........!!!
हम चैन से कैसे सोए?
जब कोई भूखा रोए!

कहाँ जाऊँ? क्या करूँ?
कि पा जाऊ रोटीयाँ!
किस ओर मुड़ू की हो जाए कुछ,
और पा जाऊँ रोटीयाँ,
फेंके कबाड़ से लोगो के,
दो वक्त का जुगाड़ है मेरा,
मैं नादान नहीं समझ,
कैसा व्यापार है मेरा!
औरों के नजर में बीन रहा,
अपने नजर में चुन रहा,
हर अनजान मोड़ पर मुड़ रहा हूँ,
जो फेंक गया कोई,
उसे चुन रहा हूँ,
किसी डब्बे, किसी बोतल से,
भर रही मेरी बोरीयाँ,
फूटा है भाग्य या
कर रहा आख मिचौलियाँ,
ये बच्चे जो जा रहे स्कूल,
इनका झोला है मेरे प्रतिकुल,
उसमें किताब है, कॉपीया हैं और कलम है,
देख पा रहा हूँ,
उनकी आँखो में कैसी चमक है!
मेरी आँखो में वही कचड़े की धूल,
मेरी भूख में वही तपन है,
लग रहा है मेरी रेखाएँ,
गई है अपना भाग्य भूल!
उनके पास कलम है कि लिख लेगें भाग्य,
यहाँ जल रहा सब कुछ
मिटाने में पेट की आग,
खुशी चेहरे उनके की वो मस्त हैं
हो गया स्तब्ध मैं इस सोच से,
मेरी भूख से ही मेरा सब संताप ध्वस्त है,
घूम रहा किस शहर, किस गली,
ढूढ़ रहा हर ढ़ेर की पा जाऊँ रोटीयाँ,
सब कल्पनाएँ सीमित यहीं,
मैं गुम अनुठे खोज में,
क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?
कि पा जाऊँ रोटीयाँ !

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