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हमारे तोते फिरंगी निकले।

गाँव की माटी में पले बच्चे जब बड़े होकर शहर का हो जाते हैं तब शायद गाँव और बच्चे दोनों यही सोचते होंगे।   
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Those two innocent eyes.

  As it rains memories drain All efforts go simply in vain, somewhere deep inside You appear like a 'thunderbolt' Illuminates my dark sky, With closed eyes I mesmerise  Lived thy time in past life. Though I know what you lied passing everytime an undeniable smile How can I forget those days-nights When I performed best of my life It's all early phases I jump and dive In quest of those two innocent eyes.

घूमता मैं लाहौर

अगर मौका मिले तो घूमता मैं लाहौर एक किसी बूढ़े रिक्शे पर बैठ निहारता अबतक टिकी पूरानी ईमारतों को मैं सुनता दरककर झर रही बूढ़ी दिवारों को जब दिन का शोर थम जाता मैं ख़ोजता इसकी आत्मा चांदनी रात में क्या पता मिल ही जाए वो मुझे! किसी भवन के खंडहर में पूरानी कुर्सी पर पाँव लटकाए बैठा इस ज़माने के तौर तरीकों से बेख़बर 1947 में रूका हुआ दिल्ली के इंतजार में ।

'झूठ की थकान'

          मैं अब बोलना ही नहीं चाहता, जब भी बोलता हूँ कुछ न कुछ झूठ निकल ही जाता है और फिर बाकि सभी सत्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता, कम से कम मेरी ख़ातिर। बहुत बड़ी खाई है मेरे भीतर, शायद सबमें होती होगी, अक्सर झांककर डर से कांप जाया करता हूँ मैं। लेकिन मैं देखना बंद नहीं करता, एक बार के लिए भी इसका विचार तक भी नहीं आया, कदाचित सच की कोई चिंगारी झूठ के इस अथाह अंधेरे से हर बार टकरा जाती है, और गिरते-गिरते रह जाता हूँ मैं हर बार, थोड़े भर से, सच के हिस्से में, अपने हिस्से में! एक चिंगारी हर बार भारी पड़ जाती है मेरे संदेह पर और साहस दे जाती है, सच बोलने का और 'सच' ही बोलने का, और यही दृढ़ता बल देती है, बहुत कुछ खोने का, घृणित बनने का,अकेले रहने का।        झूठ मुझे थका देता ही कुछ ही कदम पर, जीतकर भी भीतर परास्त हो जाता हूँ मैं, इस क्षोभ से विकल मन मस्तिष्क में क्रोध उत्पन्न करता है और फिर बोलना अनिवार्य हो जाता और उच्चारित होते ही हैं कटु सत्य। ये सारा क्रम विरक्ति का कारक बनता है और फिर इस द्वंद्व की धूल झाड़ने और सत्य का सानिध्य प...

कहानी - मौन प्रेम । Silent love

         हमने तुम्हारे बारे में बहुत सुना तो अपना हुनर आजमा कर फेसबूक पर तुम्हारी बड़ी  मम्मी के प्रोफाइल से तुम्हारी तस्वीर निकाल लाए, तुम्हारा नाम फिर भी न पता होने के वजह से तुम्हारी प्रोफाइल तक पहुँचना मुनासिब न हो सका। तुम्हारी बस एक तस्वीर जिसमें तुम क्या ही खूबसूरत लग रही थी को देर तक अकेले में निहारते रहे और फोटू को बड़ा कर के तुम्हारे नयन-नक्श की मन ही मन बड़ाई करते रहें। देर रात जब नींद खुली तब तक भी तुम्हीं छायी थी सो लाजमी था तुम्हारा चेहरा ही आखों पर पहरा डाले हुए था सो मैंने फोन उठा कर तुम्हारा तस्वीर  पुनः देखने लगा, देखते-देखते न जाने कब आँख लग गयी कुछ पता ही न चला। अगली सुबह जब मेरा मिजाज एकदम अच्छा था तब दादी के चाय को पूछने पर मैंने मुस्कुराकर हाँ कहा उस दिन पता है सबको कितना आश्चर्य हुआ था, मेरे हंस कर जवाब देने का, तुम नहीं जानोगी कभी मिली नहीं न मुझसे। यहाँ सब मुझे खड़ूस समझते है एकदम सख्त पर इन्हें क्या पता कितना रस कितना उन्माद है यहाँ बस सब बचा रखा है तुम्हारे लिए…. , मिलोगी तो न? हाँ मैं तो मिल ही लूँगा, पर कब होगी ये पहली...

चेतना - A stream of consciousness.

              पढ़ते-पढ़ते आँखे थक गईं, मैं कुर्सी पर बैठा पाँवों को आगे कि तरफ खिसका दिया और सीने पर किताब रख के वहीं मेज के पास कुर्सी पर निढ़ाल लेट गया।                   कुछ देर तक सब स्थगित ही रहा... एकदम अदम सा, ऐसे में बस जारी रहीं तो सांसे। कुछ वक्त बीतता है यूँ ही तब ही सहमी सी चाल से अचानक तुफां का रूप धारण कर याद अपने हाथ-पाँव मारना शुरू करते हैं और सहसा दीमाग भी हरकत में आ जाता है, कई बातें एक साथ बंद आँखो की अंधेरे पटल पर नाचती हुई चमक उठती हैं..... कुछ इस तरह मानों समय से पहले ही स्टेशन पर खड़ी सारी रेलगाड़ीयाँ एक साथ सीटी बजता हुई खुल गई हों और सारे यात्री घबड़ा कर दौड़ पड़े हो अपने-अपने ट्रेन की तरफ..,जैसे कोई भगदड़ मच गई हो... मानों जैसे तेज तुफान में सब उड़ा जा रहा हो... धूल, मिट्टी, पत्ते... सब, बगैर किसी गंतव्य की निश्चितता के...।               मैंने शरीर की भाँती ही इन खयालों को भी अनियंत्रित-स्वतंत्र रखा और खुद-ब-खुद कुछ देर की उठा-पटक के बाद ...

काँच

एक काँच गिरा...टूट गया, जो आड़े हुए था एक राज को, अब वहाँ कुछ नहीं, राज भी नहीं, काँच भी नहीं, राज कहाँ गया? टूकड़ों में, काँच कहाँ गया? टूकड़ों में, राज क्या था? वो काँच, वो काँच! हाँ, वो काँच... जो अब सच्चा है, टूकड़ों में, किर्चों में, सच है दर्द और बहता खूँ, किसी किर्च के चुभ जाने से, उतना ही सच है, काँच का दर्द, टूट जाने का, टूकड़ों में हो जाने का, पास में ही बिखरे रहने का, और जुड़ न पाने का, मिल न पाने का, किसी को चुभ जाने का... ।
मेरी मिल्कीयत में तुम्हारी याद भी आती हैं, कमबख्त! उस लम्हे को बयाँ कौन करे.... तुम होते यहाँ तो कुछ कह भी देते, हर्फ दर हर्फ खुद को बेजुबां कौन करे.... किसी दर पे तब कोई सजदा भी कर देता, ऐ खुदा मिरी खातिर अब दुआ कौन करे.... मोहब्बत में लुटेरे ने हमें लुटा था हर पल, अब रईस कौन, इस दिल से सौदा कौन करे.... जुनुन-ए-मोहब्बत था काफिर कहलाएं, अब जो सारे दिवाने हैं हमे शर्मिंदा कौन करे.... मर गया वो मजनू वो ना रही अब लैला, रंजिश-ओ-नफरत में मोहब्बत जिंदा कौन करे.... इतना तिलिस्म, इतनी आग, जल गया तन-मन, अंजाम-ए-बेवफाई 'इश्क' अब आइंदा कौन करे! ©Gaurav Pandey
सख्त लहजे की आड़ में आज रोया जाए, सच कह के किसी अपने को खोया जाए, मासुम हैं तो कोई बरगला देगा किसी रोज, चुप रह के क्यों आबरूह को खोया जाए, फल आएँगे तो खाएंगे लोग अपने भी, चलो रंजिशें भूल मोहब्बत के बीज बोया जाए, सच कहना किसी मौके कि रस्म न हो जाए, एहले रोज जमीर को कैसे खोया जाए, दर्पण और साथी एक दूजे का होया जाए, इक शक से हमसफर आखिर कैसे खोया जाए, किसी गरीब के भूख की मीठी रोटी होया जाए, सच से रूबरू होया जाए चलो फूटपाथ पर सोया जाए, ईमान के खातिर पसीने में डूबोया जाए, खुद को खुद के खातिर रब में खोया जाए, सच कहने से पहले शरबत में डूबोया जाए, इसांफ को दलिलों से आखिर कब तक खोया जाए। ©Gaurav Pandey

इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो| Irade hain buland fir bda to ho.

इरादे हैं बुलंद फिर बड़ा तो हो| नया कुछ नहीं पर नया तो हो, इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो,  ये बाँध तो टूटे-बहाव तो आए, पतली धारओं का भी स्वाभिमान तो है, हर लहरो का साहिल से टकराव तो हो, तार-तार हो घमंड की बाढ़ तो आए कुछ हो रहा अच्छा आवाज तो आए,  इस रास्ते में कोई ठोकर तो दिख जाए, बढ़त हो मजबूत के हर कदम जीत हो,  मधुर हो जीवन के हर क्षण प्रीत हो,  छप्पर का भी अपना इक भाव तो हो,  जो सिखा दे के वो धूप-छाँव तो हो, मिजाज है बासी कुछ ताजगी तो आए, यूँ सफर है अकेला कोई साथ तो आए, मुसलसल बीत रहा है हर लम्हा, यूँ क्यों बीत जाए, कुछ बने यादें की याद तो आए, अब सांसो ने जोर पकड़ा, भुजाएँ भी फड़फड़ाई, कुछ हो के नया आई अंगड़ाई, सब हो गया बासी-सब रह गया पुराना, नया कुछ नहीं पर नया तो हो, इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो|