Skip to main content

इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो| Irade hain buland fir bda to ho.

इरादे हैं बुलंद फिर बड़ा तो हो|

नया कुछ नहीं पर नया तो हो,
इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो, 
ये बाँध तो टूटे-बहाव तो आए,
पतली धारओं का भी स्वाभिमान तो है,
हर लहरो का साहिल से टकराव तो हो,
तार-तार हो घमंड की बाढ़ तो आए
कुछ हो रहा अच्छा आवाज तो आए, 
इस रास्ते में कोई ठोकर तो दिख जाए,
बढ़त हो मजबूत के हर कदम जीत हो, 
मधुर हो जीवन के हर क्षण प्रीत हो, 
छप्पर का भी अपना इक भाव तो हो, 
जो सिखा दे के वो धूप-छाँव तो हो,
मिजाज है बासी कुछ ताजगी तो आए,
यूँ सफर है अकेला कोई साथ तो आए,
मुसलसल बीत रहा है हर लम्हा,
यूँ क्यों बीत जाए,
कुछ बने यादें की याद तो आए,
अब सांसो ने जोर पकड़ा,
भुजाएँ भी फड़फड़ाई,
कुछ हो के नया आई अंगड़ाई,
सब हो गया बासी-सब रह गया पुराना,
नया कुछ नहीं पर नया तो हो,
इरादे है बुलंद फिर बड़ा तो हो|




Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

अग्निकुण्ड : Agnikund

       मेरा, आपका, हम सबका जीवन एक 'अग्निकुण्ड' के समान होता है| हम जीवन में जीते कम और बलिदान ज्यादा देते हैं, जीवन के इस सफर में हमारे पास जब कुछ नहीं रह जाता है तब भी जो शेष रह जाता है जिससे हम पुन: सब कुछ प्राप्त कर सकते है एकमात्र वह स्वयं का स्वयं पर विश्वास और उससे उपजी उम्मीद ही होती है जो हमें आत्मबल प्रदान कर फिर से खड़ा करती है और हमें इस जीवनरण में अविजीत बनाती है और जिसके शौर्य से उपजी कीर्ति चहूँओर गूँजाएमान होती है|         ऐसी ही जीवन रण में हताशा में उम्मीद की बिगुल फूंकती मेरी एक अत्यंत ही रचनात्मक कविता.......... स्वाहा! पूजित कुण्ड, सुसज्जित कुण्ड, अग्निकुण्ड-अग्निकुण्ड स्वाहा करने पाप स्वयं के, आ पहुँचा मैं यग्यशाला प्रयासों की लकड़ीयाँ हैं, है उम्मीदों की बाती, तीव्र इच्छा और उतकण्ठा से जला रहा हूँं बाती, दहक रही है अग्नि, लहक रही है अब लकड़ी कुछ लिए हैं दुख, कुछ दिए हैं दुख, कुछ यूँ ही मिल गए हैं मुफ्त मिटा देने को सब संताप, हूँ मैं डाल रहा आहूति, दहक रही है अब अग्नि, तप रहा है अग्निकुण्ड, जला रही है बाती, दम...

बस छायांकित तुम हो...! : Bas chhayankit tum ho..!

       जब प्रेम प्रकाशित होता है तो मन में इस कदर प्रभाव उत्पन्न करता है की उसके आगे और कुछ भी दिखाई नहीं देता, प्रत्येक वस्तु में बस उसे अपने प्रियतम का चेहरा ही दिखाई देता, यहाँ तक की उसे अपने परछाईं में भी अपने प्रियतम की ही झाँकी महसूस होती है|           ऐसे ही एक समर्पित प्रेम में अपना अस्तित्व खोए एक प्रेमी का हाल बयाँ करती ये मेरी कविता...!!! स्वयं को एक दूसरे में पाना ही प्रेम है! प्रतिबिंबीत नहीं है कुछ,  बस छायांकित तुम हो है भूल गया यादों से सर्वस्व, अब बस रेखांकित तुम हो, क्या प्रयोजन? क्या सुनियोजन? जो भी बचा है जीवन में अब शेष, उन सबको आधारित तुम हो, अंतरमन में गूँज है जो, सकल शब्द उच्चारित तुम हो, जो प्रदर्शित है चहूँओर, प्रतिबिंब है मेरा और छायांकित तुम हो...!!!                                   © गौरव पाण्डेय|         

हमारे तोते फिरंगी निकले।

गाँव की माटी में पले बच्चे जब बड़े होकर शहर का हो जाते हैं तब शायद गाँव और बच्चे दोनों यही सोचते होंगे।