मैं अब बोलना ही नहीं चाहता, जब भी बोलता हूँ कुछ न कुछ झूठ निकल ही जाता है और फिर बाकि सभी सत्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता, कम से कम मेरी ख़ातिर। बहुत बड़ी खाई है मेरे भीतर, शायद सबमें होती होगी, अक्सर झांककर डर से कांप जाया करता हूँ मैं। लेकिन मैं देखना बंद नहीं करता, एक बार के लिए भी इसका विचार तक भी नहीं आया, कदाचित सच की कोई चिंगारी झूठ के इस अथाह अंधेरे से हर बार टकरा जाती है, और गिरते-गिरते रह जाता हूँ मैं हर बार, थोड़े भर से, सच के हिस्से में, अपने हिस्से में! एक चिंगारी हर बार भारी पड़ जाती है मेरे संदेह पर और साहस दे जाती है, सच बोलने का और 'सच' ही बोलने का, और यही दृढ़ता बल देती है, बहुत कुछ खोने का, घृणित बनने का,अकेले रहने का।
झूठ मुझे थका देता ही कुछ ही कदम पर, जीतकर भी भीतर परास्त हो जाता हूँ मैं, इस क्षोभ से विकल मन मस्तिष्क में क्रोध उत्पन्न करता है और फिर बोलना अनिवार्य हो जाता और उच्चारित होते ही हैं कटु सत्य। ये सारा क्रम विरक्ति का कारक बनता है और फिर इस द्वंद्व की धूल झाड़ने और सत्य का सानिध्य पाने निकल पड़ता है ये मन स्वयं की खोज में, स्वंय से थोड़ी दूर, स्वयं के साथ में,एकांत में।
मेरा, आपका, हम सबका जीवन एक 'अग्निकुण्ड' के समान होता है| हम जीवन में जीते कम और बलिदान ज्यादा देते हैं, जीवन के इस सफर में हमारे पास जब कुछ नहीं रह जाता है तब भी जो शेष रह जाता है जिससे हम पुन: सब कुछ प्राप्त कर सकते है एकमात्र वह स्वयं का स्वयं पर विश्वास और उससे उपजी उम्मीद ही होती है जो हमें आत्मबल प्रदान कर फिर से खड़ा करती है और हमें इस जीवनरण में अविजीत बनाती है और जिसके शौर्य से उपजी कीर्ति चहूँओर गूँजाएमान होती है| ऐसी ही जीवन रण में हताशा में उम्मीद की बिगुल फूंकती मेरी एक अत्यंत ही रचनात्मक कविता.......... स्वाहा! पूजित कुण्ड, सुसज्जित कुण्ड, अग्निकुण्ड-अग्निकुण्ड स्वाहा करने पाप स्वयं के, आ पहुँचा मैं यग्यशाला प्रयासों की लकड़ीयाँ हैं, है उम्मीदों की बाती, तीव्र इच्छा और उतकण्ठा से जला रहा हूँं बाती, दहक रही है अग्नि, लहक रही है अब लकड़ी कुछ लिए हैं दुख, कुछ दिए हैं दुख, कुछ यूँ ही मिल गए हैं मुफ्त मिटा देने को सब संताप, हूँ मैं डाल रहा आहूति, दहक रही है अब अग्नि, तप रहा है अग्निकुण्ड, जला रही है बाती, दम...
Comments
Post a Comment