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घूमता मैं लाहौर



अगर मौका मिले तो घूमता मैं लाहौर
एक किसी बूढ़े रिक्शे पर बैठ
निहारता अबतक टिकी पूरानी ईमारतों को
मैं सुनता दरककर झर रही बूढ़ी दिवारों को
जब दिन का शोर थम जाता
मैं ख़ोजता इसकी आत्मा चांदनी रात में
क्या पता मिल ही जाए वो मुझे!
किसी भवन के खंडहर में
पूरानी कुर्सी पर पाँव लटकाए बैठा
इस ज़माने के तौर तरीकों से बेख़बर
1947 में रूका हुआ
दिल्ली के इंतजार में ।

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