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सख्त लहजे की आड़ में आज रोया जाए,
सच कह के किसी अपने को खोया जाए,


मासुम हैं तो कोई बरगला देगा किसी रोज,
चुप रह के क्यों आबरूह को खोया जाए,

फल आएँगे तो खाएंगे लोग अपने भी,
चलो रंजिशें भूल मोहब्बत के बीज बोया जाए,

सच कहना किसी मौके कि रस्म न हो जाए,
एहले रोज जमीर को कैसे खोया जाए,

दर्पण और साथी एक दूजे का होया जाए,
इक शक से हमसफर आखिर कैसे खोया जाए,

किसी गरीब के भूख की मीठी रोटी होया जाए,
सच से रूबरू होया जाए चलो फूटपाथ पर सोया जाए,

ईमान के खातिर पसीने में डूबोया जाए,
खुद को खुद के खातिर रब में खोया जाए,

सच कहने से पहले शरबत में डूबोया जाए,
इसांफ को दलिलों से आखिर कब तक खोया जाए।

©Gaurav Pandey

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