मेरी मिल्कीयत में तुम्हारी याद भी आती हैं,
कमबख्त! उस लम्हे को बयाँ कौन करे....
तुम होते यहाँ तो कुछ कह भी देते,
हर्फ दर हर्फ खुद को बेजुबां कौन करे....
किसी दर पे तब कोई सजदा भी कर देता,
ऐ खुदा मिरी खातिर अब दुआ कौन करे....
मोहब्बत में लुटेरे ने हमें लुटा था हर पल,
अब रईस कौन, इस दिल से सौदा कौन करे....
जुनुन-ए-मोहब्बत था काफिर कहलाएं,
अब जो सारे दिवाने हैं हमे शर्मिंदा कौन करे....
मर गया वो मजनू वो ना रही अब लैला,
रंजिश-ओ-नफरत में मोहब्बत जिंदा कौन करे....
इतना तिलिस्म, इतनी आग, जल गया तन-मन,
अंजाम-ए-बेवफाई 'इश्क' अब आइंदा कौन करे!
©Gaurav Pandey

शुक्रिया
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