प्रत्यक्ष हूँ मैं और सर्वस्व प्रदर्शित,
अप्रत्यक्ष क्या?
कुछ! कुछ तो नहीं,
क्या कहते हो मेरा अंतस?
उसमें तुम्हरा ही तो राज है,
घुम कर जाँच लो!
बताना जरा क्या भाँपे,
क्या कहते हो कुछ संदिग्ध!
कुछ संदेहास्पद!
पर ऐसा क्या था?
अच्छा, केवल तुम थे,
ये भी तो निश्चित ही था न,
कोई और हो, कुछ और हो,
कैसे संभव यह?
मैं तुम में और तुम मुझमें हो,
मेरा जीवन समर्पित है तुम्हे,
ये जिंदगानी तुम्हारी है,
सर्वस्व न्यौछावर तुम पर,
तुम मेरे और मैं तुम्हारा,
बस यही तो कहानी है!
© Gaurav Pandey
अप्रत्यक्ष क्या?
कुछ! कुछ तो नहीं,
क्या कहते हो मेरा अंतस?
उसमें तुम्हरा ही तो राज है,
घुम कर जाँच लो!
बताना जरा क्या भाँपे,
क्या कहते हो कुछ संदिग्ध!
कुछ संदेहास्पद!
पर ऐसा क्या था?
अच्छा, केवल तुम थे,
ये भी तो निश्चित ही था न,
कोई और हो, कुछ और हो,
कैसे संभव यह?
मैं तुम में और तुम मुझमें हो,
मेरा जीवन समर्पित है तुम्हे,
ये जिंदगानी तुम्हारी है,
सर्वस्व न्यौछावर तुम पर,
तुम मेरे और मैं तुम्हारा,
बस यही तो कहानी है!
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