| ~सबसे परे-सबसे संलिप्त~वक्त~ |
हर होंठ का प्रश्न यही,
मैं क्यों मौन हूँ?
मेरे जवाब यही,
मैं मैन हूँ!
वो परेशान मुझ ही से,
मैं अनजान खुद ही से,
वो है सोचते की मौन हूँ,
मैं यह सोचता मैं कौन हूँ?
वो बने आलोचक मेरे खोए चैन,
मैं सोया निशचिंत सारी रैन,
वो चिल्लाएँ स्वयं पर,
खींझे गाली दे,
पूछे की पापी हूँ कैसा मैं?
क्या कहूँ कोई कहे अच्छा, कोई बुरा हूँ मैं,
पर कोई मिलावट नहीं बहुत ही खरा हूँ मैं,
बस इतना पता मुझे नहीं है कोई मुझमें भाव,
मैं टिकता नहीं, ना ही रूका कभी,
यही है मेरा स्वभाव,
सब कहते स्वयं को बड़ा, मुझे सख्त,
पर नहीं बड़ा कोई भी मुझसे, मैं हूँ वक्त!
©Gaurav Pandey.
Nice composition
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