हम अकेले चले थे, अकेले रहे,
वो मिल कर चले थे, बिछड़ कर बहे,
हम दम भरते रहें आखिरी श्वास तक,
पर हमारे कश्ती कोई सहारा ना मिला,
ना रोना कभी रोया अपने भाग्य का,
ना ही माँगा साथ किसी आप का,
यूँ ही बढ़ते चले मंजिल की तरफ,
जो साधते लक्ष्य को तो कद भी बढ़ा,
बदनामीयों का दौर बीता मगर,
जमानें से नित नया नाम मिला,
कुछ पाते मगर कुछ तो खोता रहा,
कोई ठुकरा गया था, अब अपना रहा,
उनका हूँ मैं अपना, ऐसा बतला रहा,
कई ने जोड़ा, कई जुड़े, कोई अपना गया,
पर सत्य ये भी रहा कोई हमारा न मिला,
हमने मुस्काया और ये भी स्वीकार था,
जिसने धोखा दिया था वो रोते मिले,,
एक ने हिम्मत करा और ये बोल गए,
हमको तो कोई हमारा ना मिला,
हमारी कश्ती को कोई सहारा ना मिला,
पर उनकी कश्ती को तो कोई किनारा ना मिला...|
©गौरव पाण्डेय|
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