समय सबको बराबर है पर समय कम है|कितने वेग से गुजर जा रहा है यह समय, पता तो चल रहा है परंतु कुछ हो नहीं पा रहा है, ऐसा नहीं की हम कुछ कर नहीं रहे हैं, ये कसक तो इसलिए है की मनोवृत्तानुसार कुछ मिल नहीं पा रहा है कारण संतेषहीनता नहीं है, कारण तो आशातीत परिणाम का नहीं मिल पाना है| यदि परिणाम कुछ मन के अनुसार आ भी रहा है फिर भी असंतोष के उपजने का कारण शायद मात्रा में कमी रह रही है|
लेकिन, ऐसा बार-बार निरंतर क्यों हो रहा है? जवाब में कई कारण उजागर हो रहे है, शायद कहीं न कहीं प्रयास में कमी रह जा रही है, मेहनत की दिशा ठीक नहीं है, मेहनत की मात्रा कम है या भाग्य साथ न दे रहा है या फिर केवल ईच्छा ही ईच्छा रह रही है, योजनाओं पर काम हो ही नहीं रहा है|
कारण प्रत्यक्ष है,अब चुनाव आपका है, अब यह आप पर निर्भर करता है की आप कितनी शुद्धता से ईमानदारी एवं सहजता से मौजुद दोष को अविलंब स्वीकार करते हैं, स्वीकार्यता और सुधार जितनी शीघ्रता से होग परिणाम में सुधार की गुंजाईश भी उतनी ही ज्यादा होगी|
अपने तरफ से हो रहीं गलतीयाँ तो हम सुधार सकते है यदि ईसमें कहीं भाग्य का साथ न मिल पा रहा है तो उसे रूढ़वादी सोच का ठप्पा लगाकर आगे न बढ़ ले अपितु भाग्योदय के भी तमाम उपाय जो आपके पास उपलब्ध है उसका निशचिंत भाव से उपयोग कर लाभ लें| यह जीवन और समय दोनों ही सीमित है इसलिए ठोकर खाने से पहले ही सावधान हो जाए| बुद्धीमान वही होता है जो दुसरे की गलतीयों से भी सीखता है|
याद रखें सर्वप्रथम आपका कर्म ही आपके परिणाम तय करता है तत्तपश्चात भाग्य की बारी आती है|
सदैव याद रखें यह धरा 'कर्मक्षेत्र' है और मनुष्य का जीवन 'कर्मप्रधान', इसलिए भाग्य को न कोषते हुए कर्म में विश्वास ही नहीं अपितु श्रद्धा रखें|
यदि आप युवा है तो यह तय समझिए की आप में वो शक्ति है जिससे आप अपने कर्मो से अपने भाग्य को प्रभावित कर सकते हैं|
मेहनत ही एक ऐसी चाबी है जो भाग्य का दरवाजा खोल सकती है|
कर्म करे क्योंकि कर्तव्यों के निर्वहन हेतु नि:स्वार्थ भाव से किया गया कार्य ही पूजा होता है|
©गौरव पाण्डेय|
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