कवि जो पूरी प्रकृती के उन्माद और अवसाद लिखता है, जो और सबके भावों को तो समझ लेता है, पर उसके मौन जज्बातो को भला कौन समझता है, इसी एकांकीपन को बताती ये कविता....| किससे कहूँ मैं क्या हुआ है? कौन सुने मेरी मौन व्यथा? दिन भी बीता रात आई अब, गुम उजाला, फैली काली, मैं अकेला, डर लगा है जैसे, तमस के बादल मुझको घेरे, विचलित मन में उठा पटक है कोई साथ नहीं है मेरे, क्या समस्या? कैसा असमंजस? कुछ भी ज्ञात नहीं है मेरे, अबुझ पहेली के सरीखे, लिपटे, उलझे जज्बात है मेरे, मैें मौन हूँ, अक्सर बोला जो, अंतस में मेरे धुंध हैै फैला, मैं अकेला झेल रहा हूँ, खुद ही खुद को जोड़-जोड़ कर अवसादों के दम तोड़ रहा हूँ साथ खड़ा नहीं कोई मेरे, थोड़ा सहज नहीं है पर क्या? आखिर ये हिस्से का दुख है मेरे! तब मौन अकेला झेल रहा हूँ, तब ही साथ नहीं कोई मेरे! © गौरव पाण्डेय|