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Showing posts from February, 2017

ये हिस्से का दुख है मेरे!....Ye hisse ka dukh hai mere.

 कवि जो पूरी प्रकृती के उन्माद और अवसाद लिखता है, जो और सबके भावों को तो समझ लेता है, पर उसके मौन जज्बातो को भला कौन समझता है, इसी एकांकीपन को बताती ये कविता....| किससे कहूँ मैं क्या हुआ है? कौन सुने मेरी मौन व्यथा? दिन भी बीता रात आई अब, गुम उजाला, फैली काली, मैं अकेला, डर लगा है जैसे, तमस के बादल मुझको घेरे, विचलित मन में उठा पटक है कोई साथ नहीं है मेरे, क्या समस्या? कैसा असमंजस? कुछ भी ज्ञात नहीं है मेरे, अबुझ पहेली के सरीखे, लिपटे, उलझे जज्बात है मेरे, मैें मौन हूँ, अक्सर बोला जो, अंतस में मेरे धुंध हैै फैला, मैं अकेला झेल रहा हूँ, खुद ही खुद को जोड़-जोड़ कर अवसादों के दम तोड़ रहा हूँ साथ खड़ा नहीं कोई मेरे, थोड़ा सहज नहीं है पर क्या? आखिर ये हिस्से का दुख है मेरे! तब मौन अकेला झेल रहा हूँ, तब ही साथ नहीं कोई मेरे!                                © गौरव पाण्डेय|                        

कभी हिमालय की गुफा होगी.....kabhi Himalaya ki gufa hogi

        भ्रामिकता खण्डन करने और स्वयं को पा लेने की इच्छा जब तुल पकड़ती है तो सन्यास का भाव जाग्रित होता है.... ||ओउम्|| जब दूर होगी कश्मकश, मैं चल दूँगा, जब कार्य मेरा पूर्ण होगा, मैं बढ़ लूँगा, प्रथम का गौरव छोड़, सारे बंधन तोड़, पावन गंगा को निर्मल करने, छोड़ कर मुख्य धारा, पावन धारा में बहने, ना कोई भोग, ना कोई लोभ बिन वियोग करूँगा योग, कभी हिमालय की गुफा होगी, होगा कभी गंगा का तट, अनुराग त्याग वैराग्य भाव से, मैं ध्यान मग्न और तटस्थ, उन्माद-अवसाद की कड़ीयाँ तोड़, मोड़ स्वयं को अंतस की ओर, राग-द्वेष से होकर मुक्त, मैं अपनी सीमाएँ तोड़, लूँगा स्वयं को शुन्य से  जोड!

मैं मुस्कुराता गया....Mai muskurata gaya....

उम्मीद प्रकाशित होगी जब, मिलन हमारा होगा तब! तुम दूर जाती रही, मैं गुनगुनाता रहा, मेरा विश्वास था, मैं मुस्कुराता रहा, मेरे भावों से ऊठी लहरे तमाम, मैं साहिल पे खड़ा गुनगुनाता रहा, मुझे क्या पता था, जमाना था बदला, कस्ती का अब, किनारा था बदला, चमकता हुआ चांद दागी हुआ, ऱोशनी वही थी बस उजाला था बदला, जख्म बने तो नज्म भी बदले पीर बढ़ती गई, हकिम गवाँरा हुआ, कैसे कहें की क्या-क्या हुआ, ऐसे में बसर कैसे हमारा हुआ, जो भी स्पष्ट था, सब धुआ सा दिखा, जो जला दे,वो चिंगारी भी बदली, हर चमक अब टूटा सितारा हुआ, जो भी सोचा न था वो सब कुछ हुआ, समय बीतता गया, जख्म भरते गए, रह गया दाग था जो घाव का, उनका दिया था हमारा रहा, हवाएँ चली, गम के बादल छटे, फिर बदला शहर, कोई हमारा हुआ साअत भी बदली, सियासत भी बदली, नजरें वही थी, नजाकत थी बदली, हम सीधे से थे, अब अंदाज आया, मुश्किले गईं, बहारों से राबता बन गया, मैं उलफत में फिर कायदा भूल गया, अब मुस्कुराया, फिर मुस्कुराता गया, लेकर दरिया का मजा, अब जो तुम साथ थे, मेरा विश्वास था, मैं मुस्कुराता रहा, मैं साहिल पे खड़ा गुनगुनाता रहा ...

बस छायांकित तुम हो...! : Bas chhayankit tum ho..!

       जब प्रेम प्रकाशित होता है तो मन में इस कदर प्रभाव उत्पन्न करता है की उसके आगे और कुछ भी दिखाई नहीं देता, प्रत्येक वस्तु में बस उसे अपने प्रियतम का चेहरा ही दिखाई देता, यहाँ तक की उसे अपने परछाईं में भी अपने प्रियतम की ही झाँकी महसूस होती है|           ऐसे ही एक समर्पित प्रेम में अपना अस्तित्व खोए एक प्रेमी का हाल बयाँ करती ये मेरी कविता...!!! स्वयं को एक दूसरे में पाना ही प्रेम है! प्रतिबिंबीत नहीं है कुछ,  बस छायांकित तुम हो है भूल गया यादों से सर्वस्व, अब बस रेखांकित तुम हो, क्या प्रयोजन? क्या सुनियोजन? जो भी बचा है जीवन में अब शेष, उन सबको आधारित तुम हो, अंतरमन में गूँज है जो, सकल शब्द उच्चारित तुम हो, जो प्रदर्शित है चहूँओर, प्रतिबिंब है मेरा और छायांकित तुम हो...!!!                                   © गौरव पाण्डेय|         

चलो बाहर चलें....!!! : chalo bahar chale...!

     भागते-भागते हम इतनी दूर निकल आते हैं की स्वयं ही भाग कर स्वयं से दूर हो जाते है|चाहे दफ्तर हो या घर हम कमरे में बंद रह जाते हैं, तमाम सुख और सुविधाएं भी नागवार लगने लगती हैं जब खुश तो होते पर आनंद महसूस नहीं कर पाते, और जब मन उद्विग्न हो कमरो का बंधन तोड़ता है तो जुड़ जाते है हम प्रकृति से महसूस कर पाते हैं स्वयं को और आनंदित हो जाते है|           इसी द्वदं और स्वछंदता को रेखांकित करती ये मेरी कविता.....!!! दौड़ो की पा जाओ खुद को! बहुत उब होती है इस कमरे में, चलो बाहर चले, पास में धारा नदिया की, चलो रेत पर नंगे पाँव चले, इन रेतो पर नाम लिखो, इन रेतो पर एक शाम लिखो, उकेरो कोई चित्र  की बन जाए कहानी, आज फुर्सत है, की कर जाओ मनमानी, उठाओ कोई पत्थर, कि फेको दूर, खो दो अपने आप को कि थे मजबूर, दौड़ो आँखे मूँद कर, कि भीड़ नहीं है, डरना मत की दौड़ है, कोई मीर नहीं है, आज खुद से मिले हो एक अर्से के बाद, चिल्ला लो खुब, कह लो अंतस की बात, हल्का हुआ महसूस न जाने कब के बाद, लो लंबी सांसे...

...कि पा जाऊँ रोटीयाँ ! : Ki paa jaoon Rotiyan!

      हमारे फेंके कबाड़ से भी किसी का जीवन सवरता है, जो हमारे लिए कचरे का ढ़ेर होता है वही किसी भुखे के लिए दो वक्त की ऱोटी का एक संसाधन होता है!             यह मेरी कविता एक ऐसे ही बच्चे के भावों का मार्मिक चित्रण करती है, जिसके लिए कबाड़ ही पेट की आग मिटाने का जुगाड़ है........!!! हम चैन से कैसे सोए? जब कोई भूखा रोए! कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? कि पा जाऊ रोटीयाँ! किस ओर मुड़ू की हो जाए कुछ, और पा जाऊँ रोटीयाँ, फेंके कबाड़ से लोगो के, दो वक्त का जुगाड़ है मेरा, मैं नादान नहीं समझ, कैसा व्यापार है मेरा! औरों के नजर में बीन रहा, अपने नजर में चुन रहा, हर अनजान मोड़ पर मुड़ रहा हूँ, जो फेंक गया कोई, उसे चुन रहा हूँ, किसी डब्बे, किसी बोतल से, भर रही मेरी बोरीयाँ, फूटा है भाग्य या कर रहा आख मिचौलियाँ, ये बच्चे जो जा रहे स्कूल, इनका झोला है मेरे प्रतिकुल, उसमें किताब है, कॉपीया हैं  और कलम है, देख पा रहा हूँ, उनकी आँखो में कैसी चमक है! मेरी आँखो में वही कचड़े की धूल, मेरी भूख में वही तपन है, लग रहा है मेरी रेखाएँ, ...