मैं अब बोलना ही नहीं चाहता, जब भी बोलता हूँ कुछ न कुछ झूठ निकल ही जाता है और फिर बाकि सभी सत्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता, कम से कम मेरी ख़ातिर। बहुत बड़ी खाई है मेरे भीतर, शायद सबमें होती होगी, अक्सर झांककर डर से कांप जाया करता हूँ मैं। लेकिन मैं देखना बंद नहीं करता, एक बार के लिए भी इसका विचार तक भी नहीं आया, कदाचित सच की कोई चिंगारी झूठ के इस अथाह अंधेरे से हर बार टकरा जाती है, और गिरते-गिरते रह जाता हूँ मैं हर बार, थोड़े भर से, सच के हिस्से में, अपने हिस्से में! एक चिंगारी हर बार भारी पड़ जाती है मेरे संदेह पर और साहस दे जाती है, सच बोलने का और 'सच' ही बोलने का, और यही दृढ़ता बल देती है, बहुत कुछ खोने का, घृणित बनने का,अकेले रहने का। झूठ मुझे थका देता ही कुछ ही कदम पर, जीतकर भी भीतर परास्त हो जाता हूँ मैं, इस क्षोभ से विकल मन मस्तिष्क में क्रोध उत्पन्न करता है और फिर बोलना अनिवार्य हो जाता और उच्चारित होते ही हैं कटु सत्य। ये सारा क्रम विरक्ति का कारक बनता है और फिर इस द्वंद्व की धूल झाड़ने और सत्य का सानिध्य प...