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Showing posts from 2023

हमारे तोते फिरंगी निकले।

गाँव की माटी में पले बच्चे जब बड़े होकर शहर का हो जाते हैं तब शायद गाँव और बच्चे दोनों यही सोचते होंगे।   

Those two innocent eyes.

  As it rains memories drain All efforts go simply in vain, somewhere deep inside You appear like a 'thunderbolt' Illuminates my dark sky, With closed eyes I mesmerise  Lived thy time in past life. Though I know what you lied passing everytime an undeniable smile How can I forget those days-nights When I performed best of my life It's all early phases I jump and dive In quest of those two innocent eyes.

घूमता मैं लाहौर

अगर मौका मिले तो घूमता मैं लाहौर एक किसी बूढ़े रिक्शे पर बैठ निहारता अबतक टिकी पूरानी ईमारतों को मैं सुनता दरककर झर रही बूढ़ी दिवारों को जब दिन का शोर थम जाता मैं ख़ोजता इसकी आत्मा चांदनी रात में क्या पता मिल ही जाए वो मुझे! किसी भवन के खंडहर में पूरानी कुर्सी पर पाँव लटकाए बैठा इस ज़माने के तौर तरीकों से बेख़बर 1947 में रूका हुआ दिल्ली के इंतजार में ।

'झूठ की थकान'

          मैं अब बोलना ही नहीं चाहता, जब भी बोलता हूँ कुछ न कुछ झूठ निकल ही जाता है और फिर बाकि सभी सत्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता, कम से कम मेरी ख़ातिर। बहुत बड़ी खाई है मेरे भीतर, शायद सबमें होती होगी, अक्सर झांककर डर से कांप जाया करता हूँ मैं। लेकिन मैं देखना बंद नहीं करता, एक बार के लिए भी इसका विचार तक भी नहीं आया, कदाचित सच की कोई चिंगारी झूठ के इस अथाह अंधेरे से हर बार टकरा जाती है, और गिरते-गिरते रह जाता हूँ मैं हर बार, थोड़े भर से, सच के हिस्से में, अपने हिस्से में! एक चिंगारी हर बार भारी पड़ जाती है मेरे संदेह पर और साहस दे जाती है, सच बोलने का और 'सच' ही बोलने का, और यही दृढ़ता बल देती है, बहुत कुछ खोने का, घृणित बनने का,अकेले रहने का।        झूठ मुझे थका देता ही कुछ ही कदम पर, जीतकर भी भीतर परास्त हो जाता हूँ मैं, इस क्षोभ से विकल मन मस्तिष्क में क्रोध उत्पन्न करता है और फिर बोलना अनिवार्य हो जाता और उच्चारित होते ही हैं कटु सत्य। ये सारा क्रम विरक्ति का कारक बनता है और फिर इस द्वंद्व की धूल झाड़ने और सत्य का सानिध्य प...