पढ़ते-पढ़ते आँखे थक गईं, मैं कुर्सी पर बैठा पाँवों को आगे कि तरफ खिसका दिया और सीने पर किताब रख के वहीं मेज के पास कुर्सी पर निढ़ाल लेट गया। कुछ देर तक सब स्थगित ही रहा... एकदम अदम सा, ऐसे में बस जारी रहीं तो सांसे। कुछ वक्त बीतता है यूँ ही तब ही सहमी सी चाल से अचानक तुफां का रूप धारण कर याद अपने हाथ-पाँव मारना शुरू करते हैं और सहसा दीमाग भी हरकत में आ जाता है, कई बातें एक साथ बंद आँखो की अंधेरे पटल पर नाचती हुई चमक उठती हैं..... कुछ इस तरह मानों समय से पहले ही स्टेशन पर खड़ी सारी रेलगाड़ीयाँ एक साथ सीटी बजता हुई खुल गई हों और सारे यात्री घबड़ा कर दौड़ पड़े हो अपने-अपने ट्रेन की तरफ..,जैसे कोई भगदड़ मच गई हो... मानों जैसे तेज तुफान में सब उड़ा जा रहा हो... धूल, मिट्टी, पत्ते... सब, बगैर किसी गंतव्य की निश्चितता के...। मैंने शरीर की भाँती ही इन खयालों को भी अनियंत्रित-स्वतंत्र रखा और खुद-ब-खुद कुछ देर की उठा-पटक के बाद ...