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Showing posts from March, 2018

चेतना - A stream of consciousness.

              पढ़ते-पढ़ते आँखे थक गईं, मैं कुर्सी पर बैठा पाँवों को आगे कि तरफ खिसका दिया और सीने पर किताब रख के वहीं मेज के पास कुर्सी पर निढ़ाल लेट गया।                   कुछ देर तक सब स्थगित ही रहा... एकदम अदम सा, ऐसे में बस जारी रहीं तो सांसे। कुछ वक्त बीतता है यूँ ही तब ही सहमी सी चाल से अचानक तुफां का रूप धारण कर याद अपने हाथ-पाँव मारना शुरू करते हैं और सहसा दीमाग भी हरकत में आ जाता है, कई बातें एक साथ बंद आँखो की अंधेरे पटल पर नाचती हुई चमक उठती हैं..... कुछ इस तरह मानों समय से पहले ही स्टेशन पर खड़ी सारी रेलगाड़ीयाँ एक साथ सीटी बजता हुई खुल गई हों और सारे यात्री घबड़ा कर दौड़ पड़े हो अपने-अपने ट्रेन की तरफ..,जैसे कोई भगदड़ मच गई हो... मानों जैसे तेज तुफान में सब उड़ा जा रहा हो... धूल, मिट्टी, पत्ते... सब, बगैर किसी गंतव्य की निश्चितता के...।               मैंने शरीर की भाँती ही इन खयालों को भी अनियंत्रित-स्वतंत्र रखा और खुद-ब-खुद कुछ देर की उठा-पटक के बाद ...

काँच

एक काँच गिरा...टूट गया, जो आड़े हुए था एक राज को, अब वहाँ कुछ नहीं, राज भी नहीं, काँच भी नहीं, राज कहाँ गया? टूकड़ों में, काँच कहाँ गया? टूकड़ों में, राज क्या था? वो काँच, वो काँच! हाँ, वो काँच... जो अब सच्चा है, टूकड़ों में, किर्चों में, सच है दर्द और बहता खूँ, किसी किर्च के चुभ जाने से, उतना ही सच है, काँच का दर्द, टूट जाने का, टूकड़ों में हो जाने का, पास में ही बिखरे रहने का, और जुड़ न पाने का, मिल न पाने का, किसी को चुभ जाने का... ।
मेरी मिल्कीयत में तुम्हारी याद भी आती हैं, कमबख्त! उस लम्हे को बयाँ कौन करे.... तुम होते यहाँ तो कुछ कह भी देते, हर्फ दर हर्फ खुद को बेजुबां कौन करे.... किसी दर पे तब कोई सजदा भी कर देता, ऐ खुदा मिरी खातिर अब दुआ कौन करे.... मोहब्बत में लुटेरे ने हमें लुटा था हर पल, अब रईस कौन, इस दिल से सौदा कौन करे.... जुनुन-ए-मोहब्बत था काफिर कहलाएं, अब जो सारे दिवाने हैं हमे शर्मिंदा कौन करे.... मर गया वो मजनू वो ना रही अब लैला, रंजिश-ओ-नफरत में मोहब्बत जिंदा कौन करे.... इतना तिलिस्म, इतनी आग, जल गया तन-मन, अंजाम-ए-बेवफाई 'इश्क' अब आइंदा कौन करे! ©Gaurav Pandey
सख्त लहजे की आड़ में आज रोया जाए, सच कह के किसी अपने को खोया जाए, मासुम हैं तो कोई बरगला देगा किसी रोज, चुप रह के क्यों आबरूह को खोया जाए, फल आएँगे तो खाएंगे लोग अपने भी, चलो रंजिशें भूल मोहब्बत के बीज बोया जाए, सच कहना किसी मौके कि रस्म न हो जाए, एहले रोज जमीर को कैसे खोया जाए, दर्पण और साथी एक दूजे का होया जाए, इक शक से हमसफर आखिर कैसे खोया जाए, किसी गरीब के भूख की मीठी रोटी होया जाए, सच से रूबरू होया जाए चलो फूटपाथ पर सोया जाए, ईमान के खातिर पसीने में डूबोया जाए, खुद को खुद के खातिर रब में खोया जाए, सच कहने से पहले शरबत में डूबोया जाए, इसांफ को दलिलों से आखिर कब तक खोया जाए। ©Gaurav Pandey