अब लिखना दुभर लगता है, हैे काम का जाल, एक धुन में चल रहे हैं, यह कैसा समय का चाल? जागने का तिलिस्म बड़ा, अब नींद हुई बेघर है, सूखी आखें-पलके भारी, अब सोने को मन करता है, भली देर भी सोने में पर, सुबह-सुबह उठने का डर अंतस में घर करता है, पर करना है कुछ आगे बढ़ के, गति कार्य में भरता है, नींद नहीं आती फिर है, फिर मन नहीं डरता है, कार्य दिवस का कर समाप्त, तन बिस्तर पकड़ता, नींद नहीं आती है फिर भी, वह सोने की जिद करता है, चैन-सुकुन सब खो कर जिंदा, पर आहों में भी हँसता है, कहाँ तय यह कल जागेगा ही! पर फिर भी, सुबह जागना है फिर जल्दी, रोज यही सोच कर सोता है|