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Showing posts from April, 2017

सुबह जागना है फिर जल्दी!

अब लिखना दुभर लगता है, हैे काम का जाल, एक धुन में चल रहे हैं, यह कैसा समय का चाल? जागने का तिलिस्म बड़ा, अब नींद हुई बेघर है, सूखी आखें-पलके भारी, अब सोने को मन करता है, भली देर भी सोने में पर, सुबह-सुबह उठने का डर अंतस में घर करता है, पर करना है कुछ आगे बढ़ के, गति कार्य में भरता है, नींद नहीं आती फिर है, फिर मन नहीं डरता है, कार्य दिवस का कर समाप्त, तन बिस्तर पकड़ता, नींद नहीं आती है फिर भी, वह सोने की जिद करता है, चैन-सुकुन सब खो कर जिंदा, पर आहों में भी हँसता है, कहाँ तय यह कल जागेगा ही! पर फिर भी, सुबह जागना है फिर जल्दी, रोज यही सोच कर सोता है|

तुम मेरे और मैं तुम्हारा...!

प्रत्यक्ष हूँ मैं और सर्वस्व प्रदर्शित, अप्रत्यक्ष क्या? कुछ! कुछ तो नहीं, क्या कहते हो मेरा अंतस? उसमें तुम्हरा ही तो राज है, घुम कर जाँच लो! बताना जरा क्या भाँपे, क्या कहते हो कुछ संदिग्ध! कुछ संदेहास्पद! पर ऐसा क्या था? अच्छा, केवल तुम थे, ये भी तो निश्चित ही था न, कोई और हो, कुछ और हो, कैसे संभव यह? मैं तुम में और तुम मुझमें हो, मेरा जीवन समर्पित है तुम्हे, ये जिंदगानी तुम्हारी है, सर्वस्व न्यौछावर तुम पर, तुम मेरे और मैं तुम्हारा, बस यही तो कहानी है! © Gaurav Pandey

---> वक्त~

~सबसे परे-सबसे संलिप्त~ वक्त~ हर होंठ का प्रश्न यही, मैं क्यों मौन हूँ? मेरे जवाब यही, मैं मैन हूँ! वो परेशान मुझ ही से, मैं अनजान खुद ही से, वो है सोचते की मौन हूँ, मैं यह सोचता मैं कौन हूँ? वो बने आलोचक मेरे खोए चैन, मैं सोया निशचिंत सारी रैन, वो चिल्लाएँ स्वयं पर, खींझे गाली दे, पूछे की पापी हूँ कैसा मैं? क्या कहूँ कोई कहे अच्छा, कोई बुरा हूँ मैं, पर कोई मिलावट नहीं बहुत ही खरा हूँ मैं, बस इतना पता मुझे नहीं है कोई मुझमें भाव, मैं टिकता नहीं, ना ही रूका कभी, यही है मेरा स्वभाव, सब कहते स्वयं को बड़ा, मुझे सख्त, पर नहीं बड़ा कोई भी मुझसे, मैं हूँ वक्त ! ©Gaurav Pandey.