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Showing posts from March, 2017

"समय-कर्म-भाग्य-परिणाम"

समय सबको बराबर है पर समय कम है|कितने वेग से गुजर जा रहा है यह समय, पता तो चल रहा है परंतु कुछ हो नहीं पा रहा है, ऐसा नहीं की हम कुछ कर नहीं रहे हैं, ये कसक तो इसलिए है की मनोवृत्तानुसार कुछ मिल नहीं पा रहा है कारण संतेषहीनता नहीं है, कारण तो आशातीत परिणाम का नहीं मिल पाना है| यदि परिणाम कुछ मन के अनुसार आ भी रहा है फिर भी असंतोष के उपजने का कारण शायद मात्रा में कमी रह रही है|     लेकिन, ऐसा बार-बार निरंतर क्यों हो रहा है? जवाब में कई कारण उजागर हो रहे है, शायद कहीं न कहीं प्रयास में कमी रह जा रही है, मेहनत की दिशा ठीक नहीं है, मेहनत की मात्रा कम है या भाग्य साथ न दे रहा है या फिर केवल ईच्छा ही ईच्छा रह रही है, योजनाओं पर काम हो ही नहीं रहा है|    कारण प्रत्यक्ष है,अब चुनाव आपका है, अब यह आप पर निर्भर करता है की आप कितनी शुद्धता से ईमानदारी एवं सहजता से मौजुद दोष को अविलंब स्वीकार करते हैं, स्वीकार्यता और सुधार जितनी शीघ्रता से होग परिणाम में सुधार की गुंजाईश भी उतनी ही ज्यादा होगी|    अपने तरफ से हो रहीं गलतीयाँ तो हम सुधार सकते है यदि ईसमें कहीं भाग...

Two ways - be IMMORTAL.

•Life - A journey from DAWN to DUSK•   Good morning, good morning and good morning, the day starts from here and further proceeds towards where we go, but one question arises here that is,"where we go, is that our final destination? And no doubt your answer is NO, but i would like to ask again, What is your final destination Damn sure your answer will be very frequent, I don't know!         It means you are not traveling for your destination rather than this you are just vandering here and there, now you will call me fool but I will smile and tell you not to stop but to QUITE and just WAIT & WATCH.        Just think quite for a moment, what are you doing?          Nothing so special or exact, you are just running and running, but for what you don't know, if you are thinking anything for what you are running this is not the answer, this is illusion only and the reality is far away indirectly you are r...

हम अकेले चले थे, अकेले रहे...Hm akele chle the, akele rhe...

हम अकेले चले थे, अकेले रहे, वो मिल कर चले थे, बिछड़ कर बहे, हम दम भरते रहें आखिरी श्वास तक, पर हमारे कश्ती कोई सहारा ना मिला, ना रोना कभी रोया अपने भाग्य का, ना ही माँगा साथ किसी आप का, यूँ ही बढ़ते चले मंजिल की तरफ, जो साधते लक्ष्य को तो कद भी बढ़ा, बदनामीयों का दौर बीता मगर, जमानें से नित नया नाम मिला, कुछ पाते मगर कुछ तो खोता रहा, कोई ठुकरा गया था, अब अपना रहा, उनका हूँ मैं अपना, ऐसा बतला रहा, कई ने जोड़ा, कई जुड़े, कोई अपना गया, पर सत्य ये भी रहा कोई हमारा न मिला, हमने मुस्काया और ये भी स्वीकार था, जिसने धोखा दिया था वो रोते मिले,, एक ने हिम्मत करा और ये बोल गए, हमको तो कोई हमारा ना मिला, हमारी कश्ती को कोई सहारा ना मिला, पर उनकी कश्ती को तो कोई किनारा ना मिला...|                                          ©गौरव पाण्डेय|